चतरा में थैलेसीमिया से जंग: रक्त की हर बूंद से बच सकती है किसी मासूम की जिंदगी
समाज की पहचान केवल उसकी सड़क, भवन या विकास योजनाओं से नहीं होती
सुधीर कुमार | चतरा
किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी सड़क, भवन या विकास योजनाओं से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के साथ कितना खड़ा रहता है। चतरा जिले में आज एक ऐसी ही गंभीर समस्या सामने है, जिस पर जितनी चर्चा होनी चाहिए, उतनी नहीं हो रही। यह समस्या है थैलेसीमिया से जूझ रहे बच्चों की, जिनकी जिंदगी हर महीने मिलने वाले रक्त पर टिकी हुई है।
आज चतरा रेड क्रॉस ब्लड सेंटर में O पॉजिटिव और A पॉजिटिव रक्त की भारी कमी बनी हुई है। इसका सीधा असर उन मासूम बच्चों पर पड़ रहा है, जिन्हें हर तीन से चार सप्ताह पर रक्त चढ़ाना जरूरी होता है। समय पर रक्त नहीं मिला तो उनकी जान भी जा सकती है। यह कोई सामान्य बीमारी नहीं, बल्कि ऐसी आनुवंशिक बीमारी है जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ रक्त नहीं बना पाता।
चतरा में हर महीने चाहिए लगभग 50 यूनिट रक्त
मिली जानकारी के अनुसार, चतरा जिले में थैलेसीमिया से पीड़ित 60 से अधिक बच्चे पंजीकृत हैं। इनमें लगभग 20 बच्चे B पॉजिटिव, 20 बच्चे O पॉजिटिव, 10 बच्चे A पॉजिटिव और करीब 10 अन्य रक्त समूहों के हैं। इन बच्चों के लिए हर महीने लगभग 50 यूनिट रक्त की आवश्यकता पड़ती है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाएं, प्रसव, ऑपरेशन और अन्य आपातकालीन मरीजों के लिए भी रोजाना रक्त की जरूरत बनी रहती है।
ऐसी स्थिति में यदि ब्लड बैंक में पर्याप्त रक्त उपलब्ध नहीं रहेगा, तो किसी भी मरीज की जान खतरे में पड़ सकती है।
रक्तदान नहीं, जीवनदान है
अक्सर लोग सोचते हैं कि जब जरूरत होगी, तब रक्तदान कर देंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि रक्तदान के बाद उसकी जांच, स्क्रीनिंग और अन्य प्रक्रियाओं में समय लगता है। कई बार रक्त का नमूना उच्च स्तरीय जांच के लिए रांची भी भेजा जाता है। इसलिए जरूरत पड़ने पर उसी समय रक्त उपलब्ध कराना हमेशा संभव नहीं होता। यही कारण है कि ब्लड बैंक में पहले से पर्याप्त रक्त का संग्रह होना बेहद जरूरी है।
स्वस्थ व्यक्ति हर तीन महीने में एक बार सुरक्षित तरीके से रक्तदान कर सकता है। चिकित्सा विज्ञान भी यह मानता है कि रक्तदान से शरीर पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि नया रक्त बनने की प्रक्रिया सक्रिय होती है।
रोकथाम भी जरूरी, केवल इलाज नहीं
थैलेसीमिया एक आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारी है। यह किसी संक्रमण से नहीं फैलती, बल्कि माता-पिता से बच्चों में पहुंचती है। यदि विवाह से पहले दोनों पक्षों की थैलेसीमिया कैरियर जांच (Hb Electrophoresis या HPLC टेस्ट) कराई जाए, तो इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के जन्म की संभावना को काफी हद तक रोका जा सकता है।
जिस प्रकार कई परिवार विवाह से पहले कुंडली मिलान, शिक्षा, परिवार और अन्य पहलुओं पर ध्यान देते हैं, उसी प्रकार स्वास्थ्य जांच को भी सामाजिक जागरूकता का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। यह किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम है।
सामाजिक संगठनों की भूमिका सराहनीय, लेकिन और प्रयास जरूरी
चतरा में रक्त मित्र, विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विभिन्न सामाजिक संस्थाएं, युवा संगठन तथा कई राजनीतिक दल समय-समय पर रक्तदान शिविर आयोजित करते रहे हैं। इनके प्रयासों से अनेक लोगों की जान बची है। फिर भी जिले की जरूरत के मुकाबले रक्त का संग्रह अभी भी पर्याप्त नहीं हो पा रहा है।
जरूरत इस बात की है कि रक्तदान को केवल किसी आयोजन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे नियमित सामाजिक अभियान बनाया जाए।
हम सबकी जिम्मेदारी
आज आवश्यकता केवल सरकार या रेड क्रॉस की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। यदि जिले का हर स्वस्थ युवा वर्ष में केवल तीन से चार बार रक्तदान करने का संकल्प ले, तो शायद किसी भी बच्चे को रक्त के अभाव में अस्पताल के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।
वॉयस ऑफ चतरा की ओर से जिले के सभी युवाओं, सामाजिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों, सरकारी कर्मचारियों और जागरूक नागरिकों से विनम्र अपील है कि आगे आएं और नियमित रक्तदान करें। आपकी एक यूनिट रक्त किसी थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे की मुस्कान, किसी मां की उम्मीद और किसी परिवार की पूरी दुनिया बचा सकती है।
रक्तदान महादान नहीं, बल्कि जीवनदान है। यह ऐसा दान है, जो देने वाले को भी गर्व देता है और पाने वाले को नया जीवन। चतरा को रक्त के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की जिम्मेदारी हम सभी की है। आज लिया गया एक छोटा-सा संकल्प, कल किसी मासूम की जिंदगी बचा सकता है।
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