वॉयस ऑफ चतरा की अपील रंग लाई: थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे के लिए तीन रक्तवीर बने जीवनदाता
चतरा (29 जुलाई): कहते हैं कि किसी की जान बचाने से बड़ा कोई पुण्य नहीं होता और बुधवार को चतरा में यह बात एक बार फिर सच साबित हुई। थैलेसीमिया से जूझ रहे एक मासूम बच्चे को तत्काल 'O पॉजिटिव' (O+) रक्त की आवश्यकता थी। परिजन खून की व्यवस्था को लेकर दर-दर भटक रहे थे और काफी परेशान थे। इसी बीच 'वॉयस ऑफ चतरा' ने सोशल मीडिया के माध्यम से जिलेवासियों से आगे आकर रक्तदान करने की मार्मिक अपील की।
अपील का दिखा तुरंत असर, दौड़े चले आए युवा
इस अपील का असर कुछ ही समय में देखने को मिला। चतरा के तीन युवा बिना किसी परिचय, बिना किसी स्वार्थ या प्रचार की इच्छा के सीधे रेड क्रॉस ब्लड सेंटर पहुंच गए। उन्होंने स्वेच्छा से रक्तदान कर उस मासूम की जान बचाने में अपनी अहम भूमिका निभाई। इन युवाओं ने यह साबित कर दिया कि इंसानियत आज भी जिंदा है और चतरा का समाज जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के लिए ढाल बनकर खड़ा रहता है।
इन तीन रक्तवीरों ने निभाया मानवता का धर्म
मरीज की जान बचाने के लिए जिन तीन युवाओं ने अपना 'O पॉजिटिव' रक्त दिया, वे समाज के लिए असली हीरो हैं:
ऋषभ गुप्ता (5वीं बार रक्तदान): नियमित रूप से रक्तदान करने वाले ऋषभ ने सबसे पहले अपना O पॉजिटिव रक्त दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि यदि उनके रक्त से किसी मासूम की जान बचती है, तो इससे बड़ी खुशी उनके लिए दुनिया में कोई और नहीं हो सकती।
सोनू कुमार (चौथी बार रक्तदान): सोनू कुमार भी खबर मिलते ही रेड क्रॉस ब्लड सेंटर पहुंचे। उन्होंने युवाओं से अपील करते हुए कहा कि हर स्वस्थ व्यक्ति को समय-समय पर रक्तदान करना चाहिए, क्योंकि इससे बड़ा कोई दान नहीं है।
पंकज कुमार (छठी बार रक्तदान): लगातार छठी बार अपना रक्त देकर पंकज ने एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश किया। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि रक्तदान केवल एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि समाज के प्रति हमारी निरंतर जिम्मेदारी है।
तीनों रक्तदाताओं के इस सराहनीय और निस्वार्थ कार्य के लिए बच्चे के परिजनों ने नम आंखों से उनका आभार जताया। वहीं, चतरा रेड क्रॉस ब्लड सेंटर के कर्मियों ने भी इन रक्तवीरों की पीठ थपथपाते हुए कहा कि यदि जिले के लोग इसी तरह आगे आते रहें, तो किसी भी मरीज को रक्त के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा।
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए रक्त ही है जीवन
थैलेसीमिया एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसमें मरीजों (खासकर छोटे बच्चों) को जीवित रहने के लिए नियमित अंतराल पर बाहरी रक्त चढ़ाना पड़ता है। कई बार सही समय पर खून न मिल पाने के कारण परिजनों को भारी मानसिक तनाव से गुजरना पड़ता है। ऐसे मुश्किल वक्त में स्वैच्छिक रक्तदाता किसी फरिश्ते से कम नहीं होते।
चिकित्सकों का भी स्पष्ट मानना है कि रक्तदान करने से शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि शरीर में नया खून बनता है और समय-समय पर जरूरी स्वास्थ्य जांच भी मुफ्त में हो जाती है।
चतरा में रक्त की कमी न रहे, यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी
चतरा जिले में आए दिन सड़क दुर्घटनाओं, ऑपरेशन, प्रसव, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के मरीजों को खून की आवश्यकता पड़ती रहती है। यदि जिले के युवा नियमित रक्तदान का संकल्प लें, तो किसी भी मरीज के परिजन को दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा।
'वॉयस ऑफ चतरा' जिले के सभी युवाओं, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों से अपील करता है कि वे स्वैच्छिक रक्तदान को अपनी आदत बनाएं। आपका दिया हुआ एक यूनिट रक्त किसी के घर का चिराग बुझने से बचा सकता है।
📝 संपादकीय (Editor's Note)
समाचार केवल घटनाओं का विवरण नहीं होता, बल्कि समाज को सही दिशा दिखाने का एक मजबूत माध्यम भी होता है। आज चतरा के तीन युवाओं ने रक्तदान कर यह साबित कर दिया कि एक संवेदनशील समाज की पहचान बड़े-बड़े भाषणों से नहीं, बल्कि ऐसे ही छोटे-छोटे लेकिन महान कामों से होती है।
'वॉयस ऑफ चतरा' की एक अपील पर तीन लोगों का आगे आना केवल तीन यूनिट खून की कहानी नहीं है, बल्कि यह 'भरोसे' की कहानी है। यह इस बात का प्रमाण है कि यदि समाज को सही समय पर सही सूचना मिले, तो लोग मदद करने से कभी पीछे नहीं हटते।
मैं चतरा जिले के सभी युवाओं से हाथ जोड़कर आग्रह करता हूं कि वर्ष में कम से कम एक बार स्वैच्छिक रक्तदान अवश्य करें। आपका यह छोटा-सा प्रयास किसी मासूम की मुस्कान और किसी मां की सूनी गोद भर सकता है। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा चतरा बनाएं, जहां किसी भी मरीज की जान सिर्फ इसलिए न जाए क्योंकि उसे वक्त पर खून नहीं मिल सका।
सुधीर कुमार, (संपादक, वॉयस ऑफ चतरा)
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